काबर जल पक्षी विहार जो जिला बेगुसराय राज्य बिहार में अवस्थित है, शनै: शनै: अपने अंत के करीब जा रहा है | आजादी के बाद की आधी सदी में यहाँ मनुष्य और पक्षी अपने बसेरे के लिए जो अंतहीन लड़ाई लड़ रहे थे, वह अब निर्णायक होने जा रहा है | जाहिर है मनुष्य के सामने इन पक्षियों की क्या औकात! सो वह हार रहा है |
शायद, हारना ही था उसे आखिरकार! क्योंकि इन पक्षियों का न तो कोई लिखित संविधान है, और न ही राज्य, न ही उन्हें कोई अधिकार प्राप्त है और न ही उसके लिए कोई आवाज उठानेवाला कोई राजनीतिक दल ही है |
पर एक चीज है! जो उसे प्रकृति ने वरदान में दिया है, वह है - इनकी स्वाधीनता ! उन्मुक्तता !!
ऐसी स्वाधीनता जिसके सहारे ये सारे विश्व का भ्रमण करते है, प्रकृति प्रदत्त हर नज़ारे को देखते है, चरते है, किलोल करते हैं और उड़ते हैं - आगे और आगे! क्षितिज के इस कोने से उस कोने तक | सही मायनों में स्वाधीनता इनकी ही सहचरी है, जीवन पर्यंत इनके क्षेत्राधिकार, ग्लोबल मीट, विश्व बन्धुत्वा व इनके खुद के निर्धारित अन्तराष्ट्रीय वायु मार्ग ही नहीं, बल्कि इनके प्रजनन व परिवार नियोजन तक का आयोजन प्रकृति स्वयं करती है |
निःसंधेह ऐसी स्वाधीनता तो हम मनुष्यों के पास बिल्कुल भी नहीं है | हालाँकि हम उनके होने का दंभ ही नहीं भरते, अपितु सालाना जलसे कर उसका ढिंढोरा भी पिटते है | हमाते अनंत मानवीय गुणों में एक है - "अपनी ख़ुशी के खातिर दूसरों के कष्ट से बेपरवाह रहना |" और शायद यही वजह है कि - "हम इन पक्षियों से उनका प्राकृतिक बसेरा छीन भी रहे हैं और खुद को निर्दोष भी बता रहे हैं | पता नहीं इन निरीहों का चमन उजाड़कर हम भौतिकवादी सुख का कैसा चरम हासिल करना चाहते हैं |
काबर ! एक नैसर्गिक झील है ! शायद जिसका निर्माण प्रकृति ने हजारों वर्ष पूर्व ठंढे प्रदेशों यथा - साइबेरिया, लद्दाख, हिमालय आदि से आने वाले उन प्रवासी पक्षियों के सैरगाह के रूप में किया जो सर्दी के मौसम में अगर उन जगहों पर रूक जाते तो शायद मर जाते | ये जितना लंबा रास्ता तय कर यहाँ पहुँचते है मानव वर्तमान में भी इतना सुदूर महाप्रयाण नहीं करते ! लगभग आधे ग्लोब का चक्कर लगाकर हजारों कि० मी० की दूरी तय कर हर साल और लगभग हर बार नियत समय पर इनका आना हमारी आज की उन्नत विमानन सेवा को भी शर्मिंदा कर देता है | काबर झील में पायी जानेवाली सैकड़ो तरह की जल वनस्पतियाँ व पादप एवं मछलियाँ इनका मुख्य आकर्षण हैं | यानी इनके पूरे प्रवास काल (अक्टूबर से मार्च) के दौरान भोजन रसद की व्यवस्था भी खुद प्रकृति ने ही की | Continue...
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